कॉलेज के नोटिस बोर्ड के पास भीड़ थी, पर रोहन और मोहन के लिए वहाँ का माहौल बिल्कुल अलग था। टीवाई बीकॉम (TYBCom) का रिजल्ट आ चुका था।
मोहन की उँगलियाँ काँप रही थीं। जैसे ही उसने अपना रोल नंबर देखा—88%। किसी भी सामान्य छात्र के लिए यह जश्न का मौका होता, लेकिन मोहन के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। उसके बगल में खड़ा रोहन, जिसके 38.72% आए थे, खुशी के मारे उछल पड़ा।
“भाई, निकल गया! पास हो गया!” रोहन ने चिल्लाकर अपने दोस्त को गले लगा लिया।
मोहन ने उसे अजीब नज़रों से देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कोई इतनी कम कामयाबी पर इतना शोर कैसे मचा सकता है? मोहन के दिमाग में सिर्फ एक ही बात हथौड़े की तरह बज रही थी— वो 2% कहाँ गए? मैं 90 पार क्यों नहीं कर पाया? लोग क्या कहेंगे?
दो अलग दुनिया
शाम को रोहन ने पास के ढाबे पर दोस्तों को छोटी सी पार्टी दी। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। वह जानता था कि उसने पढ़ाई के साथ-साथ अपने शौक और काम को भी समय दिया है। उसके लिए यह डिग्री सिर्फ एक ‘चेकबॉक्स’ थी जिसे उसने पार कर लिया था।
दूसरी तरफ, मोहन अपने अंधेरे कमरे में बैठा छत को ताक रहा था। उसे मिल रही हर बधाई एक ताने जैसी लग रही थी। वह खुद को ‘परफेक्ट’ बनाने की दौड़ में इतना आगे निकल गया था कि उसे ‘संतुष्टि’ का रास्ता ही याद नहीं रहा। उसकी जिंदगी अब एक अंतहीन तुलना बन चुकी थी।
वो एक पोस्ट और जलता मन
कुछ महीनों बाद, मोहन ने दफ्तर से थककर घर लौटते हुए फेसबुक खोला। स्क्रीन पर रोहन की फोटो चमकी। पीछे नीले आसमान के नीचे बर्फ से ढका माउंट फ़ूजी (जापान) था। रोहन की मुस्कान असली थी, बनावटी नहीं।
मोहन के अंदर जैसे कुछ टूट गया। एक कड़वाहट उसके गले तक आ गई।
“यह कैसे मुमकिन है? 38% वाला लड़का दुनिया घूम रहा है और मैं 88% लेकर इस केबिन में सड़ रहा हूँ?” ईर्ष्या और गुस्से ने उसे घेर लिया। उसे लगा जैसे किस्मत उसके साथ मज़ाक कर रही है।
जब रास्तें मिले
किस्मत ने उन्हें एक दिन शहर के एक पुराने चौराहे पर आमने-सामने खड़ा कर दिया। रोहन हमेशा की तरह बेफिक्र दिख रहा था। मोहन खुद को रोक नहीं पाया। महीनों का दबा हुआ गुबार बाहर निकल आया।
“एक बात बता रोहन,” मोहन ने तल्ख लहजे में पूछा, “तुझे शर्म नहीं आती? इतने कम नंबर, कोई खास मेहनत नहीं… और फिर भी तू इतनी ऐश कर रहा है? क्या यह नाइंसाफी नहीं है?”
रोहन चुप रहा। उसने मोहन की आँखों में छिपी थकान और जलन को देखा। वह समझ गया कि मोहन का मुकाबला रोहन से नहीं, खुद की बनाई हुई उम्मीदों से है।
रोहन ने शांति से मोहन के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “पता है दोस्त, फर्क नंबरों का कभी था ही नहीं। तू हमेशा ‘परफेक्ट’ होना चाहता था, और मैं हमेशा ‘खुश’ रहना चाहता था।”
उसने आगे कहा, “जब समस्या आती है, तो तू उसे अपनी पहचान बना लेता है, मैं उसे सिर्फ एक टास्क समझकर सुलझाता हूँ। तू 100 में से छूटे हुए 12 नंबरों को रो रहा है, और मैं उन 38 नंबरों में अपनी जीत देख रहा हूँ जो मुझे आगे ले आए।”
सबक
मोहन निरुत्तर था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि सफलता का मतलब केवल ऊँचे आँकड़े छूना नहीं है। असली सफलता उस ‘मानसिकता’ में है जो आपको हर हाल में गिरकर उठना और मुस्कुराना सिखाती है।
डिग्री और नंबर आपके करियर की शुरुआत तो कर सकते हैं, लेकिन जिंदगी की लंबी रेस वही जीतता है जिसका दृष्टिकोण सकारात्मक हो।
परफेक्शन के पीछे भागकर खुद को मत खोइए, प्रोग्रेस का जश्न मनाइए। क्योंकि जिंदगी अंकों के पन्नों पर नहीं, अनुभवों के रास्तों पर चलती है।
